संस्कार:पद और प्रतिष्ठा से बड़े

Spread the love

 

डॉ. सत्या सिंह

डॉ. सत्या सिंह
पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर।

2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से 2017 में उन्हें ‘देवी अवार्ड’ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सम्मानित किया।

आपको सम्मान स्वरूप मिले मेडल, प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कारों से एक कमरा भरा हुआ है।

आप ताइक्वांडो चैंपियन भी हैं।

टी.एन. शेषन जब मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तो परिवार के साथ छुट्टियां बिताने के लिए मसूरी जा रहे थे। परिवार के साथ उत्तर प्रदेश से निकलते हुऐ रास्ते में उन्होंने देखा कि पेड़ों पर कई गौरैया के सुन्दर घोंसले बने हुए हैं।

पत्नी द्वारा घोसलों की मांग –

यह देखते ही उनकी पत्नी ने अपने घर की दीवारों को सजाने के लिए दो गौरैया के घोंसले लेने की इच्छा व्यक्त की तो उनके साथ चल रहे पुलिसकर्मियों ने तुरंत एक छोटे से लड़के को बुलाया, जो वहां मवेशियों को चरा रहा था।उसे पेड़ों से तोड कर दो गौरैया के घोंसले लाने के लिए कहा।
लडके ने इंकार मे सर हिला दिया।

श्री शेषन ने इसके लिए लड़के को 10 रुपये देने की पेशकश की। फिर भी लड़के के इनकार करने पर श्री शेषन ने बढ़ा कर ₹ 50 देने की पेशकश की
फिर भी लड़के ने हामी नहीं भरी।

पुलिस ने तब लड़के को धमकी दी और उसे बताया कि साहब ज़ज हैं और तुझे जेल में भी डलवा सकते हैं। गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

लड़के द्वारा अपनी बात कहना –

लड़का तब श्रीमती और श्री शेषन के पास गया और कहा,- “साहब, मैं ऐसा नहीं कर सकता। उन घोंसलों में गौरैया के छोटे बच्चे हैं अगर मैं आपको दो घोंसले दूं, तो जो गौरैया अपने बच्चों के लिए भोजन की तलाश में बाहर गई हुई है जब वह वापस आएगी तो बच्चों को नहीं देखेगी तो बहुत दुःखी होगी जिसका पाप मैं नहीं ले सकता।”

यह सुनकर श्री टी. एन. शेषन दंग रह गए।

शेषन का अपनी आत्मकथा में खुलासा –

शेषन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

“मेरी स्थिति, शक्ति और आईएएस की डिग्री सिर्फ उस छोटे, अनपढ़ मवेशी चराने वाले लड़के द्वारा बोले गए शब्दों के सामने पिघल गई।
पत्नी द्वारा घोंसले की इच्छा करने और घर लौटने के बाद, मुझे उस घटना के कारण अपराध-बोध की गहरी भावना का सामना करना पड़ा।”

जरूरी नहीं की शिक्षा और महंगे कपड़े मानवता की शिक्षा ही दें। यह आवश्यक नहीं हैं, यह तो भीतर के संस्कारों से पनपती है। दया,करूणा,दूसरों की भलाई का भाव,छल कपट न करने का भाव मनुष्य को परिवार के बुजुर्गों द्वारा दिये संस्कारों से तथा संगत से आते है अगर संगत बुरी है तो अच्छे गुण आने का प्रश्न ही नही।

निष्कर्ष –

निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि डिग्री हमें साक्षर बना सकती है, लेकिन हमें इंसान बनाने का कार्य संस्कार ही करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *