न्यूक्लियर युग में लड़कियाँ शादी क्यों नहीं करना चाहतीं ? एक चिंतन

Spread the love

डॉ. सत्या सिंह

डॉ. सत्या सिंह
पूर्व पुलिस अधिकारी, अधिवक्ता, काउंसलर।

2011 में भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति माननीया प्रतिभा पाटिल जी के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की तरफ से 2017 में उन्हें ‘देवी अवार्ड’ से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सम्मानित किया।

आपको सम्मान स्वरूप मिले मेडल, प्रशस्ति पत्र एवं पुरस्कारों से एक कमरा भरा हुआ है।

आप ताइक्वांडो चैंपियन भी हैं।

न्यूक्लिअर युग में शादी की महत्ता –

पिछले दो दशकों में भारतीय समाज में सबसे गहरा परिवर्तन परिवार की संरचना में आया है। संयुक्त परिवारों की जगह तेज़ी से न्यूक्लियर परिवारों ने ले ली है, माता-पिता और बच्चे तक सीमित छोटी-सी इकाई। यह बदलाव केवल रहने के ढाँचे भर तक सीमित नहीं है बल्कि इसने सोच, रिश्तों, ज़िम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं तक सब कुछ प्रभावित किया है।

बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल से लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक –

इस नए दौर में एक उल्लेखनीय सामाजिक प्रवृत्ति सामने आई है कि, कई युवतियाँ शादी को अनिवार्य जीवन-लक्ष्य नहीं मान रही हैं। पहले जहाँ शादी को स्त्री की “स्वाभाविक मंज़िल” माना जाता था, आज वैचारिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वावलंबन और व्यक्तिगत आकांक्षाओं ने यह धारणा बदल दी है। इसके पीछे कारण अनेक हैं, लेकिन उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण वे बुज़ुर्ग माता-पिता भी हैं, जिनकी जिम्मेदारी लड़कियाँ अपनी प्राथमिकता समझने लगी हैं। आज की पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिला मानती है कि माता-पिता ने जिस बलिदान से उसे शिक्षा, पहचान और आत्मसम्मान दिया है, उन्हें जीवन के अंतिम वर्षों में सुरक्षित और सम्मानजनक देखभाल की आवश्यकता है और यह ज़िम्मेदारी सिर्फ पुत्रों की नहीं, पुत्रियों की भी है।

आर्थिक आत्मनिर्भरता –

पुराने समय में आर्थिक निर्भरता शादी को सामाजिक सुरक्षा का एकमात्र साधन बनाती थी। लेकिन आज स्थिति अलग है लड़कियाँ पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं, अपने निर्णय स्वयं ले रही हैं, और आर्थिक रूप से इतनी सक्षम हैं कि अकेले भी आराम से जीवन चला सकती हैं। जब आर्थिक आधार मजबूत हो जाता है, तब व्यक्ति ऐसे रिश्तों में नहीं बंधना चाहता जिसमें उसकी स्वतंत्रता या आत्मसम्मान को चुनौती मिले।

शादी कई बार महिलाओं के करियर पर सीधा प्रभाव डालती है, स्थानांतरण, ससुराल की अपेक्षाएँ, बच्चों की जिम्मेदारियाँ, और भावनात्मक दबाव…. ऐसे में सक्षम और आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाली युवतियाँ सोचती हैं कि –

“अगर मैं अकेले खुश, सुरक्षित और स्वतंत्र हूँ, तो क्यों ऐसी संस्था में बंधूँ जो मेरे आत्मविकास को सीमित कर दे?”

इसके अलावा, विवाह संस्थान में असमानता का अनुभव, घरेलू जिम्मेदारियों का असंतुलित बोझ, और मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ते दबाव ने युवतियों को पारंपरिक सोच से दूर किया है।
भारतीय परिवारों में पारंपरिक धारणा रही कि बुढ़ापे में माता-पिता का सहारा बेटा ही बनेगा। किंतु वास्तविकता बदल चुकी है। बेटियाँ भी माता-पिता की भावनात्मक, आर्थिक और चिकित्सा संबंधी ज़रूरतें अपने ऊपर ले रही हैं क्योंकि वे मानती हैं कि माता-पिता का अधिकार और प्यार दोनों पुत्र और पुत्री के लिए समान हैं। इसलिए उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व भी समान होना चाहिए।

विद्रोह नहीं वरन नैतिक जिम्मेदारी –

अक्सर लड़कियाँ देखती हैं कि शादी के बाद दूरी, सामाजिक अपेक्षाएँ और घर-परिवार की सीमाएँ उन्हें अपने माता-पिता से दूर कर देती हैं। कई बार ससुराल पक्ष की अनावश्यक शर्तें जैसे – “वहाँ जाने की जरूरत क्या है?”, “हर सप्ताह मायके क्यों?” जैसे प्रश्न भावनात्मक तनाव उत्पन्न करते हैं। ऐसी परिस्थितियों को देखकर लड़कियाँ सोचती हैं कि विवाह कहीं उनके दायित्वों और मूल्यों के बीच दीवार न बन जाए। परिणामस्वरूप कई महिलाएँ यह निर्णय लेती हैं कि, “मैं शादी तभी करूंगी जब मेरा जीवनसाथी मेरे माता-पिता के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करेगा और यदि ऐसा साथी नहीं मिला, तो न करना बेहतर है।” यह सोच किसी विद्रोह की नहीं, बल्कि एक मानवीय और नैतिक जिम्मेदारी की है।

अपनी पहचान –

आज की युवतियों में अपनी पहचान की समझ पहले से कहीं अधिक मजबूत है। वे यह नहीं चाहतीं कि उनकी पहचान सिर्फ “पत्नी” या “बहू” तक सीमित रह जाए। वे अपने सपने चाहे वह करियर हो, यात्रा हो, कला हो या सामाजिक कार्य हो, कों पूरा करना चाहती हैं। इसके साथ ही, समाज में तलाक़ की बढ़ती घटनाएँ, अपमानजनक रिश्ते, घरेलू हिंसा के मामले, और मानसिक असुरक्षा ने भी युवतियों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि – “क्या शादी वाकई जरूरी है?”

समय की आवश्यकता –

इसके अलावा, सामाजिक अपेक्षाओं का बोझ, उम्र के दबाव, “अच्छे रिश्ते” की मार्केटिंग, लड़की की “एडजस्टमेंट” पर जोर और चरित्र को लेकर दोहरे मानक….यह सब युवतियों को थका देता है और वे कई बार कह उठती हैं कि – “मुझे शादी नहीं चाहिए… मुझे सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा चाहिए।” शादी न करना किसी विद्रोह का प्रमाण नहीं, बल्कि बदलती प्राथमिकताओं और नए समय की जरूरतों का संकेत है।

शादी एक विकल्प, अनिवार्यता नहीं –

समाज को यह समझना चाहिए कि शादी विकल्प है, अनिवार्यता नहीं। संबिधान के अनुसार हर व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा चुनने का अधिकार होना चाहिए। पुत्री और पुत्र दोनों समान रूप से माता-पिता का सहारा हो सकते हैं।

माता-पिता की देखभाल एक मानवीय दायित्व –

इस तथ्य को परिवार और समाज दोनों को स्वीकार करना होगा। यदि विवाह संस्था को प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे बराबरी, सम्मान, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्पेस पर आधारित होना होगा। लड़कियों के जीवन को “समाज की इज़्ज़त” से जोड़कर मत देखिए। उनकी पसंद उनके सपनों से तय होनी चाहिए, दूसरों की अपेक्षाओं से नहीं। बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल एक मानवीय दायित्व है, और यह दायित्व केवल लड़कियों का या लड़कों का नहीं, बल्कि मनुष्य होने का कर्तव्य है।

मेरी जिंदगी मेरा निर्णय –

लड़कियों द्वारा शादी न करना किसी “समस्या” का संकेत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के विकास का परिणाम है। वे अब मजबूरी में नहीं, चयन के आधार पर निर्णय लेती हैं। वे किसी भी रिश्ते में स्वतंत्रता, सम्मान और समता चाहती हैं, और अगर उन्हें लगता है कि शादी उनके माता-पिता की सेवा, उनके सपनों या उनकी पहचान के बीच दीवार बनेगी तो वे निस्संकोच कहती हैं कि – “मेरी जिंदगी मेरा निर्णय।” यह निर्णय उनका अधिकार है, और इस अधिकार का सम्मान करना समाज की परिपक्वता का पहला प्रमाण है।

सदियों से चली आ रही पितृसत्ता का प्रभाव –

हाँ एक और बात कहना भी ज़रूरी समझती हूँ कि, सदियों से समाज में पितृसत्ता का प्रभाव रहा है, जहाँ महिला की पहचान उसकी शादी, उसके पति और उसके “परिवार” से तय होती रही। ऐसे समाज में यदि कोई लड़की स्वतंत्र होकर अकेले रहती है, अपने निर्णय खुद लेती है, तो वह पुराने ढाँचों को चुनौती देती है। यह चुनौती कई लोगों को असहज लगती है, इसलिए वे उसे “चरित्र” के सवालों से कमजोर करने की कोशिश करते हैं। क्योंकि उन्हें महिलाओं की स्वतंत्रता से होने वाला डर सताने लगता हैं….जब एक लड़की अविवाहित होकर अपनी कमाई पर जीती है, घूमती है, फैसला लेती है और अपनी इच्छा से जीती है तो समाज का एक बड़ा हिस्सा यह स्वीकार नहीं कर पाता कि स्त्री भी स्वतंत्र रह सकती है। वह स्वतंत्रता उन्हें “नियंत्रण छूटने” जैसा लगता है। इसलिए वे चरित्र पर सवाल उठाकर उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

समाज की दूषित सोच –

हमारे समाज में आज भी यह सोच है कि “अच्छी लड़की यानि शादीशुदा लड़की” और “अविवाहित लड़की यानि कुछ कमी”। शादी को लड़की के सम्मान, सुरक्षा और चरित्र का पैमाना मान लेना एक सामाजिक भ्रम है। वैसे भी आज सबको यह समझना चाहिए कि, चरित्र का विवाह से कोई संबंध नहीं हैं बल्कि चरित्र का संबंध व्यवहार, मूल्य, ईमानदारी और मानवता से है।
समाज पुरुष की स्वतंत्रता को सामान्य मानता है, लेकिन जब कोई महिला अपनी जिंदगी अपनी इच्छा से जीती है, तो लोग उसकी स्वतंत्रता को “अनैतिकता” से जोड़ देते हैं। यह दोहरा मापदंड सदियों से महिलाओं को नियंत्रित करने का एक तरीका रहा है।

बदलते समाज में बदलती मान्यताएं –

“लोग क्या कहेंगे”भारतीय समाज में यह मानसिकता बहुत गहरी है। बहुत से लोग खुद के जीवन से ज्यादा दूसरों की जिंदगी पर टिप्पणी करना पसंद करते हैं। अविवाहित लड़की को वे एक “खतरा” मान लेते हैं कि, कहीं वह उनकी मान्यताओं पर सवाल न कर दे, इसलिए उसके बारे में अफवाहें बनाना समाज के लिए आसान साधन है। अविवाहित महिला यानि आत्मनिर्भर महिला उन्हें असहज लगने लगती हैं।

अविवाहित महिला अक्सर आर्थिक रूप से सक्षम, शिक्षित और मानसिक रूप से मजबूत होती है। ऐसी महिला से कई लोग असहज होते हैं, क्योंकि वह “परंपरागत ढाँचे” के सामने झुकती नहीं। उसे सम्मान देने की बजाय समाज उसे नीचा दिखाकर अपनी सोच को सही साबित करना चाहता है।

जबकि अविवाहित लड़की चरित्रहीन नहीं होती, बल्कि वह स्वतंत्र, जिम्मेदार, आत्मनिर्भर और व्यक्तित्ववान होती हैं। चरित्र का व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति से कोई संबंध नहीं। यह सोच समाज की पुरानी, कमजोर और पक्षपाती मानसिकता का परिणाम है न कि वास्तविकता का।
समय बदल रहा है।
आज की लड़कियाँ अपनी मेहनत, शिक्षा और मूल्यों से यह साबित कर चुकी हैं कि“शादी विकल्प है, चरित्र नहीं।”

अंत में –

“मेरे चरित्र की कीमत”

मेरी उँगलियों में
नहीं चमकती कोई अंगूठी,
पर इसका मतलब यह नहीं
कि मेरा आकाश धुँधला है।

मैंने चुनी है राह अपनी,
अपने कदमों की जिम्मेदारी भी—
पर समाज कहता है,
“अविवाहित? शायद चरित्र ढीला है…”

हँसी आती है मुझे
उन नजरों पर,
जो महिला की आज़ादी को
बदनामी का नाम दे देती हैं।

मेरी पहचान किसी रिश्ते की मोहताज नहीं,
मेरे मूल्य किसी मुहर के बंद नहीं।
मेरे चरित्र की कीमत
मेरी सच्चाई से है –
न कि आपकी कल्पनाओं से।

मैं अविवाहित हूँ,
पर अपूर्ण नहीं।
मैं स्वतंत्र हूँ,
और यही मेरी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *